Maa Vandevi Presented By Shimmer Films International

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नमो देव्यै महादेव्यै सततं नमः ।

 

नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्मताम् ।।

 

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लगभग तीन सौ चौवन पचपन वर्षों से अटूट श्रध्दा व भक्ति का प्रसिध्द केन्द्र बनी मिश्रीचक राघवपुर की वनदेवी पटना जिला के दानापुर अनुमंडल के बिहटा थानान्तर्गत बिहटा रेलवे स्टेशन से करीब चार किलोमीटर की दूरी पर दक्षिण दिशा में पूरब,कंचनपुर -खडगपुर से अमहरा गॉंव से उत्तर एंव जिनपुरा से दक्षिण -पश्चिम के कोण पर निर्जन स्थान में स्थित हैं।

 

 

मिश्रो का चक यानी अर्थात भूमि का बड़ा टुकड़ा, छोटा गाँव, पुरवा होने से मिश्रीचक कहनाया । सुना जाता है कि पहले यह साठ बिगहा का एक बड़ा खंड था । सत्रहवीं शताब्दी के पाँचवे दशक में इसका विस्तार पंडित विद्यानंद नामक व्यक्ति ने किया था। वे विन्ध्याचल -देवी के परम उपासक और पहुँचे हूए भक्त थे संभव है, राघवपूर के मिश्र पहले मिश्रीचक ही रहते हो और बाद में अपनी असुविधओं को देखते हूए रामनगर राघवपुर के पास की जमीन पर बस गये हों। यह भी मुमकिन है कि निवास राघवपुर करते हों।

खोज के अनुसार पंडित स्वामीचंद के पुत्र पंडित विद्यानंद मिश्रीचक राघवपुर की वनदेवी के प्रतिष्ठापक ठहरते हैं । उनके संबध् में प्रकाश डालते हुए बाबू कालीचरण सिंह (1855 – 1939) लेखक ने लिखा है यहॉं पर श्याम शर्मा नामक एक ब्रर्ािंण रहते थे जिसके पुत्र विद्यानंद जी ने भगवती की आराध्ना कर बर ले श्रीनगर जाकर वहाँ के सब पंडितों को परास्त किया था। कहते है कि वह अपने घर आये उस समय पश्चिम से उफंट पर पुस्तक लादे कोई शास्त्राथी शास्त्रार्थ करता पिफरता था । उसने विद्यानंद जी के संम्मुख भी वही काम किया । विद्यानंद जी ने प्रश्न का उत्तर एक जलपूर्ण घट ;घड़ाद्ध से दिलाया। इस पर शास्त्रार्थी पंडित ने उस घट में अपने डंडे से प्रहार किया ।घड़ा पफूट गया और उसका कनखा ;मुख का उफपरी भागद्ध आकाश की ओर उठा । कुछ दूर उफपर जाकर पिफर नीचे पिफरा । तब उस शास्त्रीर्थी ने विद्यानंद जी कहा हे महात्मन ! अब मेरा प्राण बचाओ । भगवती क्रोध्ति भई । कहते है कि विद्यानंद जी ने कुछ अक्षत उफपर की तरपफ पफेका और बोले कि हा, बालक पर इतना क्रोध् ! बस वह कनखा वहीं एक बशोक के वृक्ष पर लटक गया । कनखा तो अब नही है, पर उस स्थान पर कनखा गोसाई के नाम से उस अशोक वन में देवी की पूजा होती है ।’’

 

 

उपर्युक्त विवरण से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि पंडित विद्यानंद ने ही मिश्रीचक में वनदेवी को प्रतिष्ठापित किया होगा । प्रश्न उठता है कि प्रतिष्ठापन -कार्य कब हुआ होगा ? जब वे विन्ध्याचल देवी से वरदान पा तथा श्रीनगर राजदरवार के पंडितों को परास्त कर कापफी ध्न के साथ अपने गॉंव लौट आये होंगे । इसके बाद उनका पश्चिम से आये शास्त्रीर्थी के साथ शास्त्रार्थ हुआ होगा जिसमें अपनी हार मान उसने घड़ा पर दंड से प्रहार किया होगा और । इस पर शास्त्रीय ने पंडित जी से प्राण बचाने का निवेदन किया होगा । तब पंडित जी ने अक्षत पफेकते हुए अपनी इष्ट देवी से कहा होगा कि हा ,बालक पर इतना क्रोध् ! उसके बाद कनखा अशोक पर लटका होगा । उसी स्थान पर देवी जी से ठीक सटे पूरब आज कनखा गोसाईं । उनकी पूजा भगवती जी के साथ होती चली आ रही हैं ।

 

 

वनदेवी की प्रतिस्थापना सोमवार 11मई 1648 ई॰ के पहले हुई होगी ऋ क्योंकि इसके पूर्व विद्यानंद जी का शिउरी में देहान्त हो चुका था और पुत्र रत्नानंद को सम्पत्ति – संबंध्ी आपसी विवाद में पंचों ने उनके पक्ष में पफैसला उक्त तिथि को दिया था । उक्त तिथि को संस्कृत में लिखित डिगरी पत्र2 मेें इस बात का उल्लेख हुआ है कि पंú श्याम शर्मा ;राध्वपुर की अप्रकाशित वंशावली में प॰ श्याम शर्मा ;राध्वपुर की अप्रकाशित वंशावली में पं॰ स्वामीचंद मिश्र वैद्यद्ध के पुत्र मानसानंद, क्षेमानंद और जयानंद पिता की आज्ञा मान शस्त्रों की शिक्षा बर्जित करने मिथिला गये ।उनके बार बार कहने पर विद्यानंद बनारस पढ़ने नहीं गये । इस पर नाराज हो पिता ने उन्हें पैत्रिक संपत्ति में हिस्सा नहीं देते हुए अलग कर दिया । तब विद्यानंद ने अपने घर ‘रामवाटिका’ जा श्वसुर को बुला अपनी पत्नी केा मैके भेजवा दिया और स्वमं विन्ध्याचल देवी की सिध्दि के लिए नियत समय तक अनुष्ठान करनाद्ध के पश्चात उन्हें देवी का वरदान मिला और वे श्रीनगर के राजदरबार में जा वहॉं के पंडितों को हरा कापफी ध्न के साथ घर लौटे । कुछ समय बीतने पर बुलाहट पर शिउरी के राजा मुकुन्द देव ;अमहरा की धरूपुर पट्टी के बाबू पूरण मल के श्वसुरद्धके यहॉं पुत्र रत्नांनद के साथ गये । जाने के पहले उन्होंने महाजन आदिनाथ का कर्ज चुकाया और अपना घर तथा अन्य संपत्ति भाई जयारनंन्द को थाती रूप में सौंपी । कुछ समय बाद शिउरी में उनका देहांत हुआ ।श्राध्द करने के बाद रत्नानंद ने चाचा से अपनी संपत्ति लौटाने की बात कही। चाचा ने इंकार किया इस पर विवाद बढ़ा और इलाके के पंच बैठाये गये । वादी -प्रतिवादी की बातें सुन अमहरा के छत्रपति राय, मुकुटमणि राय,उनके पुरोहित मनोहर पंाडेय , हीरा पांडेय और जयराम तिवारी, विलाप के रामध्न पाठक,राघवपुर के दामोदर मौआर एवं शूदन्य मौआर तथा दो इन्य लक्षीराय और रामजीउ मुकुता नामक पंचों ने रत्नानंद के पक्ष में पफैसला सुनाये। उफपर की बातें लिखने का प्रयोजन बस इतना ही है कि संपूर्ण घेरा के केन्द्रविन्दु विद्यानंद जी हैं । अतः वे ही वनदेवी के प्रतिष्ठापक हैं ।

 

मिश्रीचक की वनदेवी के संस्थापक को लेकर अन्य विचार राघवपुरवासी पं॰ अनंतराम मिश्र, पं॰ नथुनी मिश्र और पं॰ भगवती चरण मिश्र के पक्ष में सनने को मिलते हैं । वहां के मिश्र घराने की जो अद्यतन वंशावली पं॰ राम दयाल जी मिश्र के पास उपलब्ध् है उसके अनुसार कुल सोलह पिढि़यॉं होती है । उनमें पंडित स्वामीचंद जी मिश्र वैद्य उपर्फ पं॰ श्याम शर्मा पीढ़ी मेें आते है और आचार्य शिव प्रसाद मिश्र का नवजात प्रपौत्र शक्ति प्रसाद मिश्र अंतिम पीढ़ी में । विद्यानंद जी का स्थान दूसरी पीढ़ी,अनंतराम जी का नौवीं पीढ़ी, नथवीं जी का दसवीं तथा भगवती जी का ग्यारहवीं पीढ़ी में पड़ता है ।जब हमारे पास विद्यानंद जी क पक्ष में 1648 ई॰ के अप्रैल माह तक जीवित रहने का प्रमाण है, विंध्याचल जा विंध्यवासिनी को इष्ट कर आराध्ना देवी बनाने का सबूत है और मिश्रीचक की वनदेवी के पास पश्चिम से आये शास्त्रीय के साथ शास्त्रीय करने का प्रमाण है तब अन्य के पक्ष में जाने की गंुजाईस कहॉं। संभव है अनंतराम जी नथुनी जी तथा भगवती चरण जी वनदेवी-पूजा की कड़ी रहे हों ।आजतक उनके चंशज वनदेवी की पूजा पूर्ववत् करते चले आ रहे हैं। जनश्रुती के अनुसार विद्यानदं जी जबतक स्वस्थ रहे तबतक विंध्याचल जाते रहे । अस्वस्थ होने पर देवी मॉं से निवेदन करते हुए कहा कि मॉं ! मैं अब यहॉं आने में असमर्थ हूॅं।

 

आपकी अनुमति हेा तो मैं आप के पिंड में से कुछ अंश ले आपको अपने घर के पास मिश्रीचक स्थापित कर मैं और मेरे वंशज आपकी निरंतर पूजा करते रहें। देवी का स्वप्न में आशिर्वाद मिला । इस प्रकार यहाँ की देवी का अंश होने हुईं । क्षेध् विशेष की जनता इस बात को मानती है और इसी रूप में उसकी बराबर पूजा करती है। वनदेवी के तीन नाम हैं । इन दोनों से सटे पश्चिम वन में भैरव जी हैं । विन्ध्याचल की वनदेवी का अंश होने तथा मिश्रीचक के अशोक वन में प्रतिष्ठापित होने के कारण वनदवी कहलायीं। मिश्रीचक विगहा पर स्थापित होने के चलते बिगहा पर नाम दिया गया । देवी दुर्गा के लिए कापफी प्रचलित शब्द भगवती का प्रयोग होने की वजह से ‘भगवती – स्थान’कहलाया । सर्वाध्कि प्रचलित नाम वनदेवी ही है । इसी प्रकार वनदवी के सटे पूरब अशोक वन के एक वृक्ष पर कनखा ;घड़ा का उफपरी भागद्ध लटकने के और उसे देव रूप मान पूजा करने के कारण ‘कनखा गोसाईं’ नाम पड़ा । इध्र कुछ लोग इसे कनखा माई के नाम से भी जानते है और बताते हैं कि ये शास्ध्ार्थ के समय कालराध् िबनी वनदेवी की उपज हैं । वनदेवी की शोहरत साढे़ तीन सौ वर्षों से उफपर से चली आ रही है । अभी पराकाष्ठा पर हैं ।अब तक हजारों भक्तों की मनोकामना पूरी हुई है। ना जाने कितनों ने दगदम्बा की मन्नतें उतारी है जंगल में रहते हुए भी आज तक किसी केा सर्प बिच्छू नही कांटे हैं । किसी को किसी प्रकार का अहित नहीं हुआ है । किन्तु ऐसी प्रभावशाली देवी का लम्बे अंतराल तक विध्वित् मन्दिर नहीं बना । भक्तों का ऐसा विश्वास रहा कि है कि वनदेवी वन में ही रहना पसंद करती हैं । पक्का पिंड और मन्दिर बनाने पर नाराज हो शाप दे देंगी । अहित होगा। ऐसा अंध्विश्वास बींसवीं शती के प्रायः छठे दशक तक बना रहा । अतः किसी ने मंदिर बनवाने का जोखिम नहीं उठाया । सर्व प्रथम यह काम भगवान दास त्यागी नामक एक पहुँचे हुए महात्मा ने किया । वे इध्र-उध्र यज्ञ तथा अन्य धर्मिक कार्य करते हूए सन् 1958 ई॰ के भादों कृष्ण अष्टमी को अजमा ग्राम से अमहरा आये और यज्ञ करने का संकल्प किया । यज्ञ हेतु इंटों का एक बड़ा भट्ठा लगवाया ।1959 ईú में ज्येष्ठ पूर्णिमा को उनका यज्ञ समाप्त हुआ । तदुपरान्त बची ईंटों से उन्होनं गाँव के सभी धर्मिक स्थलों – गोवधर््न बाबा, राधेराम बाबा, कोइलाबीर बाबा, करमन गोसाईं और देवी-मंदिर -का जीर्णो(ार कराया । अब आम लोगों के मन से यह भय-भ्रम दूर हो गया कि भव्य मंदिर बनवाने पर अहित होगा।

 

उपयुक्त श्रृंखला की कड़ी में एक और कड़ी जुटी सन् 1995 ई॰ में अयोध्या से एक संत ज्ञानीदास ;मूल निवासी बैजलपुर, विक्रम ,पटनाद्ध ने आकर वनदेवी-परिसद में खूब ध्ूमधम से कीर्तन-भजन, देवी -गुणगान आदि के साथ यज्ञ किया और वृहद पैमाने पर प्रसाद वितरित करवाया । यज्ञ की समाप्ति के पश्चात् वहाँ बैठक कर भक्तों ने यहा निर्णय लिया कि वनदेवी का अब एक भव्य मंदिर बनवाया जाये । इसके लिए वनदेवी-मिश्रीचक-भवन -निर्माण’संघ’ नाम से रशींदे छपवायीं गयीं । ग्यारह व्यक्तियों की कमेटी बनी ।